Kulgeet
गाँधी महाविद्यालय उरई, जालौन
(संस्था का कुलगीत)
कालिंदी के सुरम्य तट की, यह सरल सुहावन तपोभूमि
नीर क्षीर से रचा है बुन्देली बापू ने जिसकी कर्मभूमि
है जिसको औद्वालक ने सजाया
जिसे वेद व्यास ने जय में उठाया
ये माहिल तालाब कुंड की नगरी, यहाँ है बीहड़ बल बुद्वि पोषक
ये रानी झाँसी की वीरता की निशानी, यहाँ है वीरबल के प्रांजल विवोधन
है जिसमें क्रांति की ज्वाला
जिसे शर्मा चतुर्भुज ने जलाया
ये है आल्हा उदल की नगरी, यहाँ है कर्म निष्ठा के तपोधन
नमन है ऐसे विद्या व्रती को, रचा है जिसने गाँधी के तपोवन
है प्रथम नमन माँ भारती को
सतत नमन बुन्देली बापू
ये है आत्मपथ की नगरी, जिसे पराशर ने तत्व मुक्ति दिलाई
पीया करे हम पिपासु बनकर, दिया करे हम ज्ञान गंगा की ज्योति
कालिंदी के सुरम्य तट की, यह सरल सुहावन तपोभूमि
नीर क्षीर से रचा है बुन्देली बापू ने जिसकी कर्मभूमि
द्वारा
डॉ मिथिलेश कुमार शुक्ल
सहायक आचार्य, गाँधी महाविद्यालय